10 अमृत तुल्य बातें जो किसी भी विद्यार्थी को चाणक्य नीति से सीखनी चाहिए।

दोस्तों आज की इस पोस्ट में मैं, एक छोटे से चंदू को अखंड भारत का सम्राट बनाने वाले महान आचार्य चाणक्य की पुस्तक चाणक्य नीति से 10 बहुत ही महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहा हूँ जिनके जान लेने से आप अपने जीवन को सही राह दे सकते हो और अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हो। मैं सभी बातों को आज के सन्दर्भ में बताने की कोशिश करूंगा।

Chanakya Neeti

चाणक्य नीति की 10 अमृत तुल्य बातें

1. व्यक्ति को एक वेदमंत्र का अध्ययन, चिंतन अथवा मनन करना चाहिए। यदि वह पुरे मंत्र का चिंतन-मनन नहीं  सकता तो उसके आधे अथवा उसके एक भाग का और यदि एक भाग का भी नहीं तो एक अक्षर का ही प्रतिदिन अध्यन करें। अपने दिन को व्यर्थ न जाने दें।  अध्यन आदि अच्छे कर्मों को करते हुए अपने दिन को सार्थक बनाने का प्रयत्न करें। - (अध्याय दो श्लोक संख्या-13 )

 दोस्तों यदि हम आज के विद्यार्थी जीवन से इसे जोड़कर देखे तो  यह श्लोक विद्यार्थी को यह सन्देश देता है कि विद्यार्थी अपने डेली सब्जेक्ट्स से परे भी प्रतिदिन कुछ महान, जीवन अपने को आगे  को बढ़ाने वाली ज्ञान को बढ़ाने वाली बातों का अध्यन और चिंतन-मनन करना चाहिए।  इसमें वह वैदिक  शास्त्रों का अध्यन कर सकता है जैसे- भगवदगीता, वेद आदि यदि सामर्थ्य हो , व्यवाहरिक जीवन की बातों को सीख सकता, प्रेरणादायक साहित्य पड़ सकता है, महान लोगो की जीवनी पड़ सकता है। अर्थार्थ इनमे से कुछ न कुछ तो प्रतिदिन पढ़ना ही चाहिए और पढ़  कर उसका चिंतन करना चाहिए ताकि वह बात आत्मसात होजाए।  सफल और महान की लोगो की यह आदत होती है की वे प्रतिदिन कुछ न कुछ ऐसा पड़ते हैं।

  2 . मुर्ख व्यक्ति से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि मनुष्य दिखता हुआ भी वह दो पैरों वाले पशु समान होता है। वह सज्जनो को अपने तीखे शब्दों द्वारा उसी प्रकार कुष्ट पहुंचता रहता है, जैसे शरीर में चुबा हुआ कांटा शरीर को निरंतर पीड़ा देता रहता है। - (अध्याय तीसरा श्लोक सख्या-7 )

 एक अच्छे गुणवान, होनहार विद्यार्थी को एक दुष्ट मुर्ख विद्यार्थी से दूर ही रहना चाहिए क्यों वह उसे कभी भी अपनी गन्दी वाणी से और अपने गंदे व्यवहार से हानि पहुंचा सकता है।  वह अच्छे विद्यार्थी को परेशानी में डाल  सकता या उसका अपयश करा सकता है। अतः दुष्ट, मुर्ख  विद्यार्थी को अपने पास फटकने न दें या उससे दूर रहे।

  3 . सुन्दर रूप वाला, यौवन से युक्त, ऊँचे कुल में उत्पन्न होने पर भी विद्या से हींन मनुष्य सुगंधरहित धाक अथवा टेसू के फूल की भांति उपेक्षित रहता है, प्रशंशा को प्राप्त नहीं होता है। - (अध्याय तीसरा श्लोक सख्या-8  )

 कोई भी विद्यार्थी अगर सुन्दर है, शरीर से काफी अच्छा दिखता और अच्छे ऊँचे और धनवान परिवार से है लकिन विद्याहीन है तो उसे कोई प्रशंशा नहीं मिलती। उसे कोई सम्मान नहीं मिलता। जिस वस्तु कि कोई उपयोगिता नहीं होती उसका तिरष्कार कर दिया जाता है। उसी तरह विद्याहीन और गुण रहित विद्यार्थी की उपेक्षा होती है। अतः विद्यार्थी को गुणवान और विद्वान होना चाहिए क्योंकि उसका काम ही है ज्ञान अर्जित करना।

  4 . कामवासना(lust) के सामान कोई रोग नहीं। मोह से बड़ा कोई सत्रु नहीं। क्रोध जैसी कोई आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर इस संसार में सुख देने वाली कोई वास्तु नहीं। - (अध्याय पांचवा श्लोक सख्या-12  )

 दोस्तों आज के दौर  में इंटरनेट पर अश्लील सामग्री भरी पड़ी और उससे बचना काफी मुश्किल है। न चाहते हुए भी वह सामने आ जाती है। आपको पता होना चाहिए की 10-11 उम्र से शरीर में sexual changes सुरु हो जाते है।  कोई विद्यार्थी जब ऐसी चीजे देख लेता है तो उसकी तरफ आकर्षित हो जाता है। और उन्हें इंटरनेट पर सर्च करके देखने लगता है, और इसका असर यह होता की विद्यार्थी अकेले में sexual एक्टिविटी  करने लगता है यानि की Masturbation  जिसमे panis से  semen(vital power ) रिलीज़ होता है  जिससे  शारीरिक और मासिक रूप से बहुत हानि होती है।

 इससे शरीर कमजोर हो जाता है और मानसिक शक्ति छिण हो जाती। दोस्तों आपको पता होता चाहिए की 1 बून्द semen यानि वीर्य की 40 खून की बूंद के बराबर होती है। और आपको यह भी  पता होना चाहिए कि अगर अपने आज खाना खाया है तो उससे semen बनने में 1  महीना लग जाता है। तो सोचिये की यहाँ semen कितना कीमती है। अतः इन कुकर्मों  बच कर रहना चाहिए अन्यथा विद्यार्थी की बर्बादी तय है।

 दोस्तों आपको क्रोध करने से बचना चाहिए और कहें तो  करना ही नहीं चाहिए क्योंकि यह भी इंसान को बर्बाद कर देता है। भागवद्गीता में बताया गया है कि क्रोध करने वाला नरक(hell) को जाता है। साथ ही आपको किसी चीज़ का घमंड भी नहीं करना चाहिए क्योंकि यह भी इन्शान को नीचे गिरा देता है।

अतः विद्यार्थी को इन तीनो को छोड़कर  ज्ञान के अर्जन पर पूरा ध्यान लगाना चाहिए क्योंकि यही सभी चीजों को दिलाने वाला है और सुख देने वाला है जो की स्थाई है।

  5. धर्म में निरंतर लगे रहना(अच्छे काम), मुख से मीठे वचन बोलना, दान देने में सदैव उत्सुक रहना, मित्र के प्रति कोई भेद-भाव न रखना, गुरु के प्रति नम्रता और अपने हृदय में घंभीरता, अपने आचरण में पवित्रता, गुणों के ग्रहण करने में रुचि, शास्त्रों का विशेष ज्ञान, रूप में सौंदर्य और प्रभु में भक्ति आदि का होना - ये गुण सज्जन पुरषों में ही दिखाई देते है। - (अध्याय  बारहवां श्लोक सख्या-14)

 दोस्तों इस श्लोक में बताये गए सभी गुणों को अगर कोई विद्यार्थी अभी से अपना ले तो उसे जीवन में कभी भी निराशा और दुःख का सामना नहीं करना पड़ेगा।

  6. कार्य छोटा हो या बड़ा व्यक्ति को शुरू  से ही उसमे पूरी शक्ति  लगा देनी चाहिए, यह शिक्षा हम सिंह से ले सकते हैं। (अध्याय  छठा श्लोक सख्या-15) दोस्तो यहाँ आचार्य चाणक्य ने बहुत ही शानदार बात कही है।  अगर विद्यार्थी अपने लक्ष्य में शुरू से ही पूरी शक्ति लगा दे तो सफलता लगभग तय है। लक्ष्य चाहे एग्जाम में पुरे मार्क्स लाना हो, कोई compitition जितना हो या कोई और शुरू से पूरी शक्ति से आगे बढ़ना चाहिए ।

  7. बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को वश में करके समय के अनुरूप अपनी क्षमता को तौलकर बगुले के समान अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए। - (अध्याय  छठा श्लोक सख्या- 16)

 जब बगुला मछली को  पकड़ने के लिए एक टांग पर खड़ा होता है, तब उसे मछली के के शिकार के अतिरिक्त अन्य किसी बात का ध्यान नहीं होता। इसी प्रकार विद्यार्थी को चाहिए की जब वह  किसी कार्य की सफलता के लिए प्रयत्न करें तो अपनी इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए और मन को चंचल नहीं होने देना चाहिए। तथा मन/ध्यान  सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य पर हो और कही नहीं।

  8.इस संसार में विद्वान् की प्रशंसा होती है। विद्वानों को ही आदर-सम्मान और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।  प्रत्येक वास्तु की प्राप्ति विद्या द्वारा ही होती है और विद्या की सब जगह पूजा होती है। - (अध्याय  आठवां  श्लोक सख्या- 20)

 अतः दोस्तों विद्या ग्रहण विद्यार्थी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

  9. विद्यार्थी के लिए आवश्यक है कि वह काम, क्रोध, लोभ, स्वादिष्ट पदार्थो की इच्छा, श्रृंगार, खेल-तमाशे(गलत कार्य), अधिक सोना और चापलूसी करना आदि  इन आठ बातों का त्याग कर दे। - (अध्याय  ग्यारहवां  श्लोक सख्या- 10 )

  10. दुष्कर्म (गलत काम) करने के बाद पश्चाताप करने वाले मनुष्य की बुद्धि जिस प्रकार की होती है, वैसी बुद्धि यदि पाप(गलत काम) करने से पहले भी हो जाये तो सभी को मुक्ति प्राप्त हो सकती है।  - (अध्याय  चौदह  श्लोक सख्या- 7 )

 दोस्तों, विद्यार्थी  अगर गलत काम करने से पहले ही उसके  परिणामों के बारें में गहराई से सोच ले और  संभल जाय तो शायद गलत काम न हो।

निष्कर्ष

ऊपर बताई गयी बातों को अगर विद्यार्धी अपना ले तो  वह अपने जीवन में  सफल, सुखी और अनुकरणीय हो सकता है और दुःख, पश्चाताप और निराशा से सदैव दूर रह सकता है ।

 दोस्तों, उम्मीद है मेरा यह प्रयास और ये बातें आप को काफी पसंद आयी होगी।  और आपको काफी ज्ञान मिला होगा। इन  बातों के बारें में अपने विचार बताए।  बताए कौनसी बात आपको सबसे अच्छी लगी और अपनाना चाहते है ।

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 पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद।

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